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रुद्री / रुद्रष्टाध्यायी क्या है ?

रुद्रष्टाध्यायी या रुद्री के बारे में हम सब ने कभी न कभी, कुछ न कुछ तो सुना ही होगा जेसे की आज शिवमंदिर मे रुद्री है या लघुरुद्र है | ब्राह्मण और शिव उपासक के द्वारा शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उत्तम पाठ यानि रुद्री |

रुद्री के विषय मे कहा जाता है की “रुत द्रव्यति इति रुद्री”, यानि की रुत का अर्थ होता है दुख और दुख का कारण, उसे जो दूर करता है, उसका जो नाश करता है वो रुद्र है और इसे शिव के रुद्र स्वरूप को प्रसन्न करने की स्तुति यानि रुद्री |

वेदों में रुद्री के विषय मे जो मंत्र है उसे शुक्ल यजुर्वेदीय, कृष्ण यजुर्वेदीय, रुगवेदीय मंत्र कहा जाता है | सौराष्ट्र – गुजरात में शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्र मंत्र ज्यादा प्रचलित है |

रुद्री की यह स्तुति, रुद्री में आठ अध्याय होने की वजह से उसे रुद्रष्टाध्यायी कहा जाता है | इस स्तुति में रुद्र की जो मुख्य आठ मूर्तिया है पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चंद्र, सूर्य, और आत्मा, उसके स्वरूप का वर्णन है |

संक्षिप्त मे इन अध्यायों में :

  • प्रथम अध्याय में गणपती जी की स्तुति है |
  • द्वितीय अध्याय में भगवान विष्णु की स्तुति है |
  • तृतीय अध्याय में इन्द्र की स्तुति है |
  • चतुर्थ अध्याय में सूर्य नारायण की स्तुति है |
  • पंचम अध्याय वह हार्द है इसमे रुद्र की स्तुति है |
  • षष्ठम अध्याय में मृत्युंजय की स्तुति है |
  • सप्तम अध्याय में मरुत देवता की स्तुति है | और
  • अष्टम अध्याय में अग्नि देवता की स्तुति है |

इस प्रकार आठ अध्याय में तमाम देवताओ की स्तुति हो जाती है | शिव सभी देवो में व्याप्त होते है और शिवलिंग में सभी देवो का समावेश हो जाता है इसलिए शिवलिंग पर अभिषेक करते समय सभी आठ अध्याय का पाठ कर सकते है |

पंचम अध्याय जो की इस स्तुति का मुख्य भाग है, इसमे ६६ मंत्र है | एक से चार अध्याय का उसके बाद पाँचवे अध्याय का ग्यारह बार आवर्तन और उसके बाद छः से आठ अध्याय के पठन से एक रुद्री पूर्ण होती है |

मुख्य चीज रुद्री के पाँचवे अध्याय का ग्यारह बार पाठ करना होता है जिसे एकादशीनी भी कहा जाता है |

शिव के समक्ष इस पाठ के आरोह – अवरोह और शुद्ध उच्चारण से बोला जाए तो उसे पठातमक रुद्री कहा जाता है | इस पठन के साथ शिवलिंग के ऊपर जल या किसी द्रव्य का अभिषेक चालू हो तो उसे रुद्राभिषेक कहा जाता है और इस रीत से यज्ञ भी करते है तो उसे होमात्मक रुद्री कहा जाता है |

पाँचवे अध्याय का ११ बार आवर्तन लेने की जगह उसके आठवे अध्याय के साथ संपुट लेने की पद्धति को नमक – चमक कहा जाता है | अब अगर पाँचवा अध्याय १२१ बार आवर्तन हुआ है तो उसे लघुरुद्र कहा जाता है |

रुद्री / रुद्रष्टाध्यायी करने से क्या फायदे होते है ?

  • लघुरुद्र के ११ आवर्तन को महरुद्र और
  • महरुद्र के ११ आवर्तन को अतिरुद्र कहा जाता है |
  • रुद्री के १ बार पठन से बच्चों के रोग मिटते है |
  • रुद्री के ३ बार पठन से मुसीबत से छुटकारा मिलता है |
  • रुद्री के ५ बार पठन से ग्रहों की नकारात्मक असर काम होती है |
  • रुद्री के ११ बार पठन से धनलाभ और राजकीय लाभ प्राप्त होते है |
  • रुद्री के ३३ बार पठन से इच्छाओ की पूर्ति होती है और शत्रुओ का नाश होता है |
  • रुद्री के ९९ बार पठन से पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति होती है |

रुद्राभिषेक, शिव आराधना का सर्व श्रेष्ठ तरीका है, क्योंकि वैदिक मंत्रों के श्रवण और मंदिर की ऊर्जा से साधक तन्मय हो जाता है और साधक में शिवतत्व का उदय होता है |

इसके अलावा भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन को बताए ११ मंत्रों के समूह को “पुराणोक्त रुद्राभिषेक” कहा जाता है | यह पाठ ११ बार करने से एक रुद्री जितना फल मिलता है | इसका उच्चारण सरल होने की वजह से यह पाठ ज्यादा प्रचलित है | इसके बावजूद वेद मंत्र की रुद्री के पठन की बात ही कुछ और है |

समय का अभाव या अन्य किसी वजह से अगर वैदिक रुद्री के पाँचवे अध्याय का ११ बार पठन ना हो सके एस हो तो क्रमशः पाठ करे | उसमे आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति के मन – बुद्धि – कवच – ह्रदय – नेत्र और सबंध के विषय मे निर्मलता मिले उस प्रकार की वैदिक ऋचा होती है | शुक्ल यजुर्वेदी वैदिक रुद्री का क्रमश: पाठ करना कल्याणकारी है |

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જન્માક્ષર (જન્મકુંડળી), જ્યોતિષ, સત્યનારાયણ કથા, રાંદલ, વાસ્તુ પૂજાં, લગ્ન વિધિ, ચાંદલા, ખાતમુહુર્ત, મહામૃત્યુંન્જય યજ્ઞ, નવચંડી, ભાગવત કથા, લઘુરુદ્ર, ગણેશ પૂજાં, શાંતિ હવન, નવગ્રહ દોષ શાંતિ, અનુષ્ઠાન, પ્રાણ પ્રતિષ્ઠા, રુદ્ર અભિષેક માટે સંપર્ક કરો : ૯૮૨૫૪૨૪૨૬૦ (9825424260), ૯૦૯૯૨૩૨૮૨૪ (9099232824)